छत्तीसगढ़ की राजनीति में जब भी मैदानी अंचल और अनुसूचित जाति (SC) वोट बैंक का विश्लेषण होता है, तो उसका केंद्र बिंदु ‘गुरु परिवार’ और उनका सामाजिक-धार्मिक प्रभाव ही रहा है। पोला-तीजा पर्व के अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मौजूदगी में कैबिनेट मंत्री गुरु खुशवंत साहेब के बड़े भाई गुरु ढाल दास साहेब का कांग्रेस का दामन थामना केवल एक साधारण दल-बदल नहीं है। एक ही छत के नीचे पले-बढे और एक ही गुरु-परंपरा का प्रतिनिधित्व करने वाले दो भाइयों का सत्ता और विपक्ष के दो विपरीत ध्रुवों पर खड़ा होना राज्य के सियासी समीकरणों में एक बड़े राजनीतिक पुनर्गठन का स्पष्ट संकेत देता है।
10 आरक्षित सीटें ही नहीं, 30 विधानसभाओं का व्यापक प्रभाव
छत्तीसगढ़ की राजनीति का एक स्थापित सच यह है कि राज्य की 90 में से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 10 सीटें (आरंग, नवागढ़, मस्तुरी, पामगढ़, सरायपाली, बिलाईगढ़, सारंगढ़, अहिवारा, डोंगरगढ़ और मुंगेली) सत्ता की दिशा तय करती आई हैं। लेकिन सतनामी समाज का राजनीतिक असर केवल इन 10 सीटों तक सीमित नहीं है।
सामान्य सीटों पर निर्णायक भूमिका: रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग संभाग की लगभग 20 से 25 सामान्य सीटों (जैसे बलौदाबाजार, कसडोल, भाटापारा, तखतपुर, बेलतरा, जांजगीर-चांपा, चंद्रपुर और कवर्धा) पर इस वर्ग के मतदाता 15% से 35% तक की संख्या में मौजूद हैं। ये मतदाता किसी भी उम्मीदवार की हार-जीत तय करने का सामर्थ्य रखते हैं।
द्वि-ध्रुवीय मुकाबला: ऐतिहासिक रूप से मैदानी इलाकों में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का एक मजबूत कैडर आधारित जनाधार हुआ करता था, जो जांजगीर और बिलासपुर बेल्ट में वोटों का विभाजन करता था। हाल के वर्षों में बसपा के कमजोर पड़ने के कारण यह पूरा दलित वोट बैंक अब सीधे तौर पर भाजपा और कांग्रेस के बीच केंद्रित हो गया है। ऐसे में गुरु परिवार का रुख दोनों ही दलों के लिए संजीवनी का काम करता है।
बीते एक दशक का चुनावी इतिहास: जिधर गुरु परिवार, उधर सत्ता
पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नज़र डालें तो यह स्पष्ट होता है कि जिस दल को गुरु परिवार और सतनामी समाज का समर्थन मिला, राज्य में सरकार उसी की बनी:
2013 का चुनाव: गुरु बालदास साहेब ने ‘सतनाम सेना’ के बैनर तले तीसरे मोर्चे के रूप में चुनाव लड़ा। इस बिखराव से कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगी और भाजपा ने 10 आरक्षित सीटों में से 9 पर ऐतिहासिक जीत हासिल कर डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सरकार बनाई।
2018 का चुनाव: चुनाव से ठीक पहले गुरु बालदास साहेब का झुकाव कांग्रेस की ओर हुआ। परिणाम 2013 के ठीक उलट रहा; कांग्रेस ने आरक्षित 10 में से 7 सीटें जीतीं और 68 सीटों के विशाल बहुमत के साथ 15 साल का वनवास खत्म किया।
2023 का चुनाव: गुरु परिवार ने एक बार फिर पाला बदला और ‘कमल’ का हाथ थामा। भाजपा ने गुरु बालदास के बेटे गुरु खुशवंत साहेब को आरंग से मैदान में उतारा, जहाँ उन्होंने निवर्तमान मंत्री को हराकर जीत हासिल की। पार्टी ने उन्हें कैबिनेट में शामिल कर यह संदेश दिया कि सतनामी समाज को सत्ता में सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का नज़रिया: संतुलन या सामाजिक असंतोष..?
गुरु ढालदास साहेब के इस कदम को राजनीतिक विश्लेषक दो अलग-अलग कोणों से देख रहे हैं:
रणनीतिक व पारिवारिक संतुलन: भारत के कई प्रमुख राजनीतिक घरानों में यह रणनीति देखी गई है कि परिवार के सदस्य दोनों प्रमुख विरोधी दलों में मौजूद रहते हैं। इससे सत्ता परिवर्तन की स्थिति में भी परिवार का प्रशासनिक रसूख, सामाजिक दबदबा और राजनीतिक प्रासंगिकता बनी रहती है।
गहराता सामाजिक असंतोष: हाल के महीनों में प्रदेश में घटित सामाजिक घटनाओं (विशेषकर गिरौदपुरी धाम अमर गुफा प्रकरण और बलौदाबाजार में भड़की हिंसा के बाद समाज के युवाओं पर हुई कानूनी कार्रवाइयों) ने समाज के एक वर्ग में बेचैनी पैदा की है। ढाल दास द्वारा सरकार के कामकाज पर सवाल उठाना और कांग्रेस का मंच चुनना इस सामाजिक असंतोष को एक राजनीतिक आकार देने का प्रयास हो सकता है।
2028 के चुनावी संग्राम के लिए दलों के सामने चुनौतियाँ
यह घटनाक्रम भले ही 2028 के विधानसभा चुनावों से काफी पहले हुआ हो, लेकिन इसने दोनों प्रमुख दलों के रणनीतिकारों को समय से पहले मंथन करने पर मजबूर कर दिया है:
कांग्रेस के लिए अवसर और चुनौती: 2023 की हार के बाद कांग्रेस के लिए मैदानी इलाकों के इस पारंपरिक वोट बैंक को दोबारा साधना अस्तित्व की लड़ाई है। ढाल दास के माध्यम से पार्टी 2018 के फॉर्मूले को पुनर्जीवित करना चाहती है। हालाँकि कांग्रेस के लिए चुनौती यह होगी कि वह ढाल दास के प्रभाव का उपयोग कर धरातल पर कैडर और युवाओं को कितना एकजुट कर पाती है।
भाजपा के लिए साख की परीक्षा: सरकार में कैबिनेट मंत्री होने के बावजूद परिवार का एक प्रमुख सदस्य यदि विपक्ष में जाता है, तो भाजपा के सामने यह साबित करने की चुनौती होगी कि समाज का बड़ा वर्ग आज भी सरकार की नीतियों के साथ खड़ा है। मंत्री गुरु खुशवंत साहेब पर अब केवल अपनी विधानसभा ही नहीं, बल्कि पूरे मैदानी अंचल में पार्टी के आधार को मजबूत रखने का दोहरा दबाव होगा।
यह घटनाक्रम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में दलित वोट बैंक को लेकर खींचतान अब एक नए मुहाने पर पहुँच चुकी है। यदि गुरु परिवार का यह आंतरिक विभाजन समाज के भीतर वोटों के ध्रुवीकरण में बदलता है, तो 2028 का मुकाबला राज्य के चुनावी इतिहास का एक बेहद दिलचस्प और अप्रत्याशित संग्राम साबित होगा।

