नेशनल हाईवे 53 पर स्थित महानदी पुल इन दिनों एक ऐसे दृश्य का गवाह बन रहा है जो प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के अंतर को उजागर करता है। पारागांव और निसदा की सीमा पर महानदी पर बने इस प्रमुख पुल से नीचे देखने पर दिनदहाड़े बड़े पैमाने पर रेत का अवैध उत्खनन साफ दिखाई दे रहा है।
अवैध रेत माफिया बिना किसी डर के रोज़ाना सैकड़ों ट्रैक्टरों के माध्यम से नदी का सीना चीरकर रेत निकाल रहे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि जहाँ से आम जनता और राहगीरों को यह कारनामा साफ-साफ नज़र आ रहा है, वहीं संबंधित विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों को यह सब दिखाई नहीं दे रहा है।
कार्रवाई के कुछ ही दिनों बाद फिर शुरू हुआ खेल
इधर,कुछ दिन पहले ही खनिज विभाग की टीम ने कुरूद और हरदीडीह सीमा पर स्थित रेत खदान पर दबिश देकर कार्रवाई की थी। लेकिन अधिकारियों के जाते ही माफिया के हौसले फिर बुलंद हो गए और वहां दोबारा धड़ल्ले से अवैध उत्खनन शुरू हो चुका है। नदी के अस्तित्व पर मंडराते इस खतरे और लगातार हो रही चोरी से स्थानीय लोगों और राहगीरों में गहरा रोष है। क्षेत्रवासी अब खुले तौर पर सवाल उठा रहे हैं।
निरीक्षण दल की भूमिका पर सवाल: आखिर खनिज विभाग का वह अमला कहाँ है जो नियमित निरीक्षण का दावा करता है..?
सिर्फ शिकायत पर ही जागता है प्रशासन.? अधिकारी हमेशा किसी लिखित या मौखिक शिकायत का इंतजार क्यों करते हैं.? क्या विभाग बिना शिकायत के खुद संज्ञान लेकर छापामार कार्रवाई करने में सक्षम नहीं है.?
मौन का कारण क्या..? नेशनल हाईवे जैसे व्यस्त मार्ग के नीचे खुलेआम हो रही इस चोरी पर कार्रवाई न होना विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
यदि समय रहते इस अवैध उत्खनन पर ठोस और स्थाई प्रतिबंध नहीं लगाया गया, तो न केवल पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी, बल्कि महानदी के प्राकृतिक प्रवाह और पुल के अस्तित्व पर भी गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों ने जिला प्रशासन तथा खनिज विभाग के उच्च अधिकारियों से मांग की है कि कागजी कार्रवाई से इतर धरातल पर कड़ा रुख अपनाया जाए और इस अवैध कारोबार में संलिप्त लोगों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।

