लोक-आस्था, समर्पण और पति की दीर्घायु की कामना का छत्तीसगढ़ी महापर्व ‘तीजा’ (हरतालिका तीज) पूरे राज्य में हर्षोल्लास और पारंपरिक गरिमा के साथ मनाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ी संस्कृति में तीज का त्यौहार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि बेटियों के प्रति मायके के अटूट प्रेम, भाइयों के न्योते और सुहागिनों के अटूट विश्वास का सबसे बड़ा उत्सव है। तीज के कठिन 36 घंटे के निर्जला उपवास से ठीक एक दिन पहले आज प्रदेश भर में ‘करूभात’ (करेले की सब्जी और भात) खाने की सदियों पुरानी परंपरा पूरी निष्ठा के साथ निभाई गई।
करूभात का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व
छत्तीसगढ़ी संस्कृति में तीजा व्रत की शुरुआत ‘करूभात’ ग्रहण करके की जाती है। मान्यता है कि उपवास से पूर्व की रात सास या मायके की बुजुर्ग महिलाओं द्वारा प्रेम से तैयार किया गया करूभात खाने से व्रत बिना किसी विघ्न के पूरा होता है। यह परंपरा संयम, त्याग और सात्विकता का प्रतीक मानी जाती है, जहाँ कड़वे स्वाद को सहर्ष स्वीकार करके आने वाले कठिन नियम का संकल्प लिया जाता है।
आयुर्वेद और सेहत की दृष्टि से अनूठा विज्ञान
करूभात की इस लोक-परंपरा के पीछे हमारी प्राचीन आयुर्वेदिक बुद्धिमत्ता छिपी हुई है:
शरीर का शुद्धिकरण (डिटॉक्सीफिकेशन): भादो (मानसून) के मौसम में खान-पान में बदलाव के कारण पाचन संबंधी समस्याएं बढ़ जाती हैं। करेला रक्त शोधक होता है और शरीर से टॉक्सिन्स को बाहर निकालता है।
36 घंटे के निर्जला व्रत का आधार: करेले के सेवन से पेट पूरी तरह साफ और हल्का रहता है। इससे अगले 36 घंटे के लंबे निर्जला उपवास के दौरान महिलाओं को गैस, डिहाइड्रेशन या जी मिचलाने जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता।
मायके की देहरी पर उमड़ा स्नेह, पारंपरिक पकवानों से महके घर
तीजा पर्व का छत्तीसगढ़ी स्वरूप मायके के बिना अधूरा माना जाता है। भाइयों के न्योते पर बेटियों और बहनों के मायके पहुंचने के साथ ही गांव-गांव और शहरों के घर-घर में उत्सव का माहौल है।
अंचल में तीजा के विशेष ‘कलेवा’—ठेठरी, खुरमी, अनरसा, गुझिया और चौसेला बनाने की तैयारियां जोरों पर हैं। करूभात के बाद अब महिलाएं पूर्ण निष्ठा के साथ 36 घंटे का निर्जला व्रत रखेंगी। रात भर जगराता (रतजगा) कर बालू-मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित की जाएगी और फुलेरा सजाकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी।

