15 अक्टूबर से ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) यूपीआई (UPI) लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत तक मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के फैसले पर पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ.शिवकुमार डहरिया ने गंभीर सवाल उठाए हैं।

NPCI (नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया) के नियमों के मुताबिक, ₹75,000 या उससे अधिक के लेनदेन पर MDR की अधिकतम सीमा ₹300 तय की गई है। हालांकि, यह स्पष्ट किया गया है कि आम नागरिकों से कोई सीधा शुल्क नहीं लिया जाएगा, लेकिन डॉ. डहरिया ने इस व्यवस्था के अप्रत्यक्ष प्रभावों पर सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है।

व्यापारी पर अतिरिक्त लागत का असर अंततः बाजार पर: डॉ. डहरिया

डॉ. शिवकुमार डहरिया ने कहा कि यह सही है कि ग्राहकों पर कोई सीधा प्रभार नहीं लगाया जा रहा है, लेकिन जब व्यापारियों पर अतिरिक्त लागत का बोझ पड़ेगा, तो उसका असर बाजार और वस्तुओं की कीमतों पर किस रूप में दिखेगा, इस पर सरकार को स्थिति साफ करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत में डिजिटल भुगतान को जन-जन तक पहुंचाने में यूपीआई की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में नया शुल्क ढांचा लागू करते समय छोटे व्यापारियों के हितों की सुरक्षा और पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करना आवश्यक है—विशेषकर उन कारोबारियों के लिए जिनका मुख्य व्यापार डिजिटल भुगतान पर ही निर्भर है।

पारदर्शिता की आवश्यकता: NPCI ने डिजिटल बुनियादी ढांचे, साइबर सुरक्षा और नवाचार को मजबूत करने के लिए शुल्क लगाने का तर्क दिया है। डॉ. डहरिया ने मांग की कि सरकार सार्वजनिक करे कि इस शुल्क से एकत्र होने वाली राशि का उपयोग किस अनुपात में और कहां किया जाएगा।

उपभोक्ता और छोटे व्यापारी पर न पड़े बोझ: डॉ. डहरिया ने व्यंग्य करते हुए कहा कि यूपीआई को लोकप्रिय बनाने में जनता और छोटे व्यापारियों का सबसे बड़ा योगदान रहा है। अब सुविधा के नाम पर आने वाले इस नए खर्च का बोझ अप्रत्यक्ष रूप से उनकी जेब से नहीं वसूला जाना चाहिए।

नियमित समीक्षा की मांग: उन्होंने कहा कि इस फैसले का वास्तविक प्रभाव लागू होने के बाद ही सामने आएगा, इसलिए सरकार और NPCI को इसकी निरंतर समीक्षा करनी चाहिए।

“डिजिटल इंडिया का वास्तविक उद्देश्य केवल लेनदेन की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि इस व्यवस्था को आम आदमी और छोटे कारोबारियों के लिए सरल, सुरक्षित और किफायती बनाए रखना भी है।”

— डॉ. शिवकुमार डहरिया, पूर्व मंत्री

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