आरंग तहसील अंतर्गत राजस्व विभाग की कथित मिलीभगत से भू-माफिया और रसूखदारों का एक बड़ा सिंडिकेट सक्रिय है, जो छोटे-छोटे भू-खंडों को विवादित बताकर हड़पने का खेल रच रहा है। इस पूरे फर्जीवाड़े का शिकार क्षेत्र के सीधे-साधे और गरीब किसान बन रहे हैं।
पटवारी कार्यालय से तहसील कार्यालय तक बना ‘फर्जीवाड़े का नेटवर्क’
सूत्रों के मुताबिक, जमीनों को विवादित बनाने की पटकथा पटवारी कार्यालय से शुरू होती है और तहसील कार्यालय तक जाकर अंजाम दी जाती है। वर्षों पुरानी और निर्विवाद जमीनों को अचानक दस्तावेजों का हेरफेर कर किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर दिखा दिया जाता है। इसके बाद किसानों को जमीन संबंधी विवाद का डर दिखाकर तहसील के चक्कर काटने पर मजबूर किया जाता है।
औने-पौने दामों में जमीन बेचने का दबाव
लंबी कानूनी प्रक्रिया और तहसील के चक्करों से थक चुके गरीब किसानों की मजबूरी का फायदा रसूखदार उठाते हैं। विवाद निपटाने के नाम पर सिंडिकेट के लोग किसानों पर दबाव बनाते हैं और अंततः उनकी कीमती जमीनों को औने-पौने दामों में खरीद लेते हैं।
संरक्षण पर खड़े हो रहे गंभीर सवाल
तहसील कार्यालय में ऐसे दर्जनों मामले सामने आ रहे हैं, जहां किसान अपनी ही जमीन के हक के लिए भटक रहे हैं। अब धीरे-धीरे पीड़ित किसान एकजुट होकर सामने आ रहे हैं। इस पूरे मामले ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर इतने बड़े खेल को किसका राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है..?
इस संगठित भू-माफिया सिंडिकेट और राजस्व विभाग की मिलीभगत से जुड़े कई चौंकाने वाले तथ्यों का खुलासा बहुत जल्द होने वाली है।

